True Worship Lord Kabir
आज का उद्देश्य सत्य भक्ति प्रभु,अल्लाह, परमेश्वर का संदेश आप तक
एक समय एक अंधा व्यक्ति भयंकर वन की ओर जाने वाले मार्ग पर जा रहा था, आगे एक आंखों वाला सभ्य व्यक्ति मार्ग पर खड़ा था,
उसने सूरदास जी से पूछा कहां जा रहे हो ? सूरदास से उत्तर मिला बाग में, सभ्य व्यक्ति ने बताया जिस मार्ग पर आप जा रहे हैं यह बागों में जाने वाला मार्ग नहीं है, यह तो भयंकर जंगल की ओर जा रहा है जिसमें हिंसक पशु शेर,भेड़िए रहते हैं,
तेरा जीवन अंत कर देंगे, यदि वह अंधा कहे कि किसने देखा है, मैं ठीक जा रहा हूं सभ्य व्यक्ति फिर कहेगा आप मेरी बात मानो अन्यथा आप पर घोर आपत्ति आएगी, फिर वह सूरदास कहे कि देखी जाएगी जो होगा, क्या यह बुद्धिमानी है? उत्तर मिलेगा नहीं।
विचार करें :- नेत्रहीन को दिखाई नहीं देता, आंखों वाला व्यक्ति नेक राय दे रहा है, उसकी बात नहीं मान रहा है तो उसका वह कष्ट उठाना पड़ेगा जो आंख वाला सब व्यक्ति बता रहा था स्वयं दिखाई देता नहीं आंखों वाले की मानता नहीं तो पढ़ो भाड़ में, बुद्धिमता तो यह है कि तुरंत माने और आग्रह करें कि मुझे बाग का मार्ग बता दो।
"संत तथा सद ग्रंथ आंखों वाले हैं" संसारी व्यक्ति अध्यात्म नेत्रहीन है ,
उनको महापुरुषों तथा सद ग्रंथों में लिखी नेक राय पर विश्वास करके बुरा काम त्याग कर सुमार्ग ग्रहण करके अपना कल्याण कराना हितकर है।
वाणी : - गरीब दास 📑
स्वर्ग सात असमान पर, भटकत है मन मूढ़ ।खालिक तो खोया नहीं, इसी महल में ढूंढ।।
सरलार्थ :-
संतो के लिए सर्व धर्म तथा देश के व्यक्ति अपने जैसे होते हैं, वह मानव मात्र के कल्याण के लिए ही उपदेश दिया करते हैं ,
इस वाणी संख्या में संत गरीबदास जी ने विशेषकर मुसलमान धर्म को मानने वाले को समझाया है ,उनका मानना है कि अल्लाह परमात्मा ऊपर सातवें आसमान पर है,
तो आप पृथ्वी पर कभी मक्का, कभी मदीना, कभी किसी पीर की मजार पर क्यों भटक रहे हो, परमात्मा कहीं गुम नहीं हुआ है, यदि उसको खोजना चाहता है, तो मानव शरीर रूपी महल में ढूंढे सत्य साधना करके उस परमेश्वर को प्राप्त कर।
वाणी :- गरीब दास 📑
कर्म भरम भारी लगे, संसा सूल बबूल ।
डाली पानो डोलते, परसत नाहीं मूल।।
सरलार्थ :- जब तक संपूर्ण आध्यात्मिक ज्ञान नहीं होता तब तक संशय बबूल के कांटे के समान चुभत रहता है, कोई भी भ्रमित कर देता है ,
अपनी क्रिया पर शंका हो जाती है फिर दूसरे की क्रिया स्वीकार करना मुश्किल होता है, जब तक संपूर्ण ज्ञान नहीं होता, तू जो क्रिया कर रहा है वह कठिन भी लगती है जैसे बैठकर या खड़े होकर हठ योग द्वारा तप करना, हरिद्वार से पैदल चलकर कांवड़ में लाना आदि-आदि कठिन लगती है, तथा भ्रम अविश्वास भी रहता है ,
फिर साधक संपूर्ण आध्यात्मिक ज्ञान के अभाव से संसार रूपी वृक्ष के मूल को ना पूंजकर डाली तथा पत्तों को पूजता है।
" यह सत्य आधारित कहानी समाज के सभी मानव पर लागू होती है चाहे हिंदू हो या मुसलमान या सिख हो या फिर ईसाई या फिर बौद्ध हो या कोई और सभी मानव के लिए सीख संतों ने बताई है "
हमारे सनातन सद ग्रंथ वेद है जिसमें परमात्मा अल्लाह की महिमा का गुणगान किया गया है, जो प्रभु आकर इस संसार में वाणी और कवियों ,दोहों के माध्यम से गा गा कर समाज में बताता है।
संसार का बुद्धिमान प्राणी दोहों , कविताओं का अर्थ समझकर सत्य मार्ग ग्रहण करता है और एक नेक मार्ग पर चलकर अपने घर की खोज करता है, जहां से आत्मा चल कर आई थी,
" उस स्थान को संतों ने सतलोक कहां है"
गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागू पायं।
बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो मिलाय।।
(वेद ,बाइबल ,कुरान शरीफ ,गुरु ग्रंथ साहिब इन धार्मिक पुस्तकों में प्रमाण कबीर साहेब का लिखा गया है )
हिंदू मुस्लिम सिख ईसाई सभी धर्मों के भाइयों व बहनों, माताओं से निवेदन है कि पुस्तक ज्ञान गंगा डाउनलोड करके पढ़े और अपने परिवार को व स्वयं परमात्मा के सत मार्ग पर लगाकर भक्ति करें
📚पुस्तक हिंदी और इंग्लिश और उर्दू तीन भाषाओं की pdf नीचे दी जा रही है,
Hindi pdf 👇
https://www.jagatgururampalji.org/gyan_ganga_hindi.pdf
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एक समय एक अंधा व्यक्ति भयंकर वन की ओर जाने वाले मार्ग पर जा रहा था, आगे एक आंखों वाला सभ्य व्यक्ति मार्ग पर खड़ा था,
उसने सूरदास जी से पूछा कहां जा रहे हो ? सूरदास से उत्तर मिला बाग में, सभ्य व्यक्ति ने बताया जिस मार्ग पर आप जा रहे हैं यह बागों में जाने वाला मार्ग नहीं है, यह तो भयंकर जंगल की ओर जा रहा है जिसमें हिंसक पशु शेर,भेड़िए रहते हैं,
तेरा जीवन अंत कर देंगे, यदि वह अंधा कहे कि किसने देखा है, मैं ठीक जा रहा हूं सभ्य व्यक्ति फिर कहेगा आप मेरी बात मानो अन्यथा आप पर घोर आपत्ति आएगी, फिर वह सूरदास कहे कि देखी जाएगी जो होगा, क्या यह बुद्धिमानी है? उत्तर मिलेगा नहीं।
विचार करें :- नेत्रहीन को दिखाई नहीं देता, आंखों वाला व्यक्ति नेक राय दे रहा है, उसकी बात नहीं मान रहा है तो उसका वह कष्ट उठाना पड़ेगा जो आंख वाला सब व्यक्ति बता रहा था स्वयं दिखाई देता नहीं आंखों वाले की मानता नहीं तो पढ़ो भाड़ में, बुद्धिमता तो यह है कि तुरंत माने और आग्रह करें कि मुझे बाग का मार्ग बता दो।
"संत तथा सद ग्रंथ आंखों वाले हैं" संसारी व्यक्ति अध्यात्म नेत्रहीन है ,
उनको महापुरुषों तथा सद ग्रंथों में लिखी नेक राय पर विश्वास करके बुरा काम त्याग कर सुमार्ग ग्रहण करके अपना कल्याण कराना हितकर है।
वाणी : - गरीब दास 📑
स्वर्ग सात असमान पर, भटकत है मन मूढ़ ।खालिक तो खोया नहीं, इसी महल में ढूंढ।।
सरलार्थ :-
संतो के लिए सर्व धर्म तथा देश के व्यक्ति अपने जैसे होते हैं, वह मानव मात्र के कल्याण के लिए ही उपदेश दिया करते हैं ,
इस वाणी संख्या में संत गरीबदास जी ने विशेषकर मुसलमान धर्म को मानने वाले को समझाया है ,उनका मानना है कि अल्लाह परमात्मा ऊपर सातवें आसमान पर है,
तो आप पृथ्वी पर कभी मक्का, कभी मदीना, कभी किसी पीर की मजार पर क्यों भटक रहे हो, परमात्मा कहीं गुम नहीं हुआ है, यदि उसको खोजना चाहता है, तो मानव शरीर रूपी महल में ढूंढे सत्य साधना करके उस परमेश्वर को प्राप्त कर।
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कर्म भरम भारी लगे, संसा सूल बबूल ।
डाली पानो डोलते, परसत नाहीं मूल।।
सरलार्थ :- जब तक संपूर्ण आध्यात्मिक ज्ञान नहीं होता तब तक संशय बबूल के कांटे के समान चुभत रहता है, कोई भी भ्रमित कर देता है ,
अपनी क्रिया पर शंका हो जाती है फिर दूसरे की क्रिया स्वीकार करना मुश्किल होता है, जब तक संपूर्ण ज्ञान नहीं होता, तू जो क्रिया कर रहा है वह कठिन भी लगती है जैसे बैठकर या खड़े होकर हठ योग द्वारा तप करना, हरिद्वार से पैदल चलकर कांवड़ में लाना आदि-आदि कठिन लगती है, तथा भ्रम अविश्वास भी रहता है ,
फिर साधक संपूर्ण आध्यात्मिक ज्ञान के अभाव से संसार रूपी वृक्ष के मूल को ना पूंजकर डाली तथा पत्तों को पूजता है।
" यह सत्य आधारित कहानी समाज के सभी मानव पर लागू होती है चाहे हिंदू हो या मुसलमान या सिख हो या फिर ईसाई या फिर बौद्ध हो या कोई और सभी मानव के लिए सीख संतों ने बताई है "
हमारे सनातन सद ग्रंथ वेद है जिसमें परमात्मा अल्लाह की महिमा का गुणगान किया गया है, जो प्रभु आकर इस संसार में वाणी और कवियों ,दोहों के माध्यम से गा गा कर समाज में बताता है।
संसार का बुद्धिमान प्राणी दोहों , कविताओं का अर्थ समझकर सत्य मार्ग ग्रहण करता है और एक नेक मार्ग पर चलकर अपने घर की खोज करता है, जहां से आत्मा चल कर आई थी,
" उस स्थान को संतों ने सतलोक कहां है"
गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागू पायं।
बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो मिलाय।।
(वेद ,बाइबल ,कुरान शरीफ ,गुरु ग्रंथ साहिब इन धार्मिक पुस्तकों में प्रमाण कबीर साहेब का लिखा गया है )
हिंदू मुस्लिम सिख ईसाई सभी धर्मों के भाइयों व बहनों, माताओं से निवेदन है कि पुस्तक ज्ञान गंगा डाउनलोड करके पढ़े और अपने परिवार को व स्वयं परमात्मा के सत मार्ग पर लगाकर भक्ति करें
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आप सभी को धन्यवाद🙏




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